संसद और राजनीति के गलियारों में अक्सर नाम और नीतियों को लेकर बहस छिड़ती रहती है, लेकिन हाल ही में दीपेंद्र हुड्डा ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। हुड्डा ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि एक तरफ तो वे भगवान राम के नाम का सहारा ले रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ जनकल्याण और मजदूरों के लिए आवंटित बजट में निरंतर कटौती कर रहे हैं।

हुड्डा ने विशेष रूप से भगवान राम के नाम के उच्चारण और उसके साथ जुड़ी मर्यादा पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का नाम पूरी गरिमा के साथ लिया जाना चाहिए। भाजपा द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे संक्षिप्त नामों और शब्दावलियों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भाजपा को भगवान राम का पूरा नाम लेने में कोई परेशानी है? उनके अनुसार, भाजपा जिस तरह से नाम की राजनीति कर रही है, वह मर्यादा के अनुकूल नहीं है।

हुड्डा का सबसे गंभीर प्रहार बजट आवंटन को लेकर था। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने बजट को 100 प्रतिशत से घटाकर मात्र 60 प्रतिशत कर दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि सरकार वास्तव में भगवान राम के आदर्शों पर चलना चाहती है, तो उसे गरीब तबके और मजदूरों के बजट में कटौती करने के बजाय उसे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “राम जी भी ऊपर से यह देखकर सोचते होंगे कि मेरा नाम तो लिया जा रहा है, लेकिन काम गरीबों के विरोध में हो रहा है।”

इसके साथ ही, दीपेंद्र हुड्डा ने योजनाओं से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम हटाने के प्रयासों की भी कड़ी निंदा की। उन्होंने इसे ‘नाम की राजनीति’ करार देते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माताओं और आराध्य देवों का नाम राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना और उनके नाम पर चल रही योजनाओं के फंड कम करना विरोधाभासी है।

हुड्डा ने स्पष्ट किया कि उन्हें भगवान राम के नाम पर किसी भी सकारात्मक कार्य से कोई आपत्ति नहीं है और भगवान राम सभी की आस्था के प्रतीक हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आस्था का प्रदर्शन केवल नारों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह सरकारी नीतियों और बजट में भी झलकना चाहिए। उन्होंने मांग की कि सरकार को अपनी मंशा स्पष्ट करनी चाहिए और संसद के पटल पर खुलकर अपनी नीतियों को रखना चाहिए।

अंत में, उन्होंने भाजपा सरकार को नसीहत दी कि यदि वे भगवान राम का नाम लेते हैं, तो उन्हें उनके बताए मार्ग पर चलते हुए बजट में वृद्धि करनी चाहिए ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति को लाभ मिल सके। राजनीति में नामों के परिवर्तन और बजट में भारी कमी के इस मुद्दे ने अब एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिससे आने वाले समय में सरकार की घेराबंदी और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।