• कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी पहुंचे RSS प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत हरियाणा के 2 दिन के दौरे पर रहे। डॉ. भागवत अपने दूसरे दिन के दौरे पर शनिवार को कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी पहुंचे। जहां उन्होंने यूनिवर्सिटी के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के मद्देनजर आयोजित गोष्ठी में शिक्षाविदों‌, रिटायर्ड IAS व IPS और न्यायाधीशों के साथ अपने विचार साझा किए।

डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण ही संघ के कार्य का मूल आधार हैं। नैतिक मूल्य, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय जरूरी है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। उन्होंने परिवार की भूमिका पर विशेष बल दिया।

बच्चों को करवाएं उचित-अनुचित का बोध

उन्होंने कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए। जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है। यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं।

संघ को समझने के लिए संघ में आना जरूरी

उन्होंने कहा कि संघ के बारे में जो बोला वह आपने सुना है, यह कैसा और क्यों हुआ है, इसको जानने के बाद संघ को और आगे कैसे बढ़ा सकते हैं, यह इसकी कल्पना है। संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर और कल्पना और फैलाए जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है।

संघ को समझने आ रहे 5 महाद्वीपों के लोग

सरसंघचालक ने कहा कि 5 महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उसके पास में ऐसा ढांचा नहीं है। जिस तरह से सूर्य और आकाश जैसा कोई नहीं है, उसी तरह से संघ के साथ जैसा दूसरा संगठन नहीं है।

संघ राजनीतिक संगठन नहीं

उन्होंने कहा कि संघ के 1.30 लाख सेवा कार्य चलते हैं। इसके बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। संघ किसी एक परिस्थिति के एक्शन या विरोध में नहीं चला, बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को देश पर कोई प्रभाव नहीं जमाना और ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है।

अपनी जमीन पर हुई हार क्यों हुई

उन्होंने कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ देश की हार हुई। भारत का एक लंबा कालखंड रहा, जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था कि एक बार हार गए तो क्या हुआ…।

इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति कि लिए तब 1860 में क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश नहीं, फिर से स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ. हेडगेवार से भगत सिंह, राजगुरु, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह प्रयास लगातार जारी रहे।

संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में

सभागार में कार्यक्रम के शुभारंभ से पहले संघ की 100 वर्ष की यात्रा वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ. हेडगेवार का मूलमंत्र संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में…इस वृत्त चित्र में सामने था।